ईरान के दो बड़े तेल टैंकरों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जो किया उसने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रातों की नींद उड़ा दी है। ये कोई जासूसी फिल्म का सीन नहीं था। हकीकत में ईरान ने दिखाया कि जब आप दुनिया के सबसे ताकतवर देश की पाबंदियों के बीच घिर जाते हैं, तो तकनीक ही आपका सबसे बड़ा हथियार बनती है। इन जहाजों ने अपनी जीपीएस लोकेशन बदल दी। इसे तकनीकी भाषा में 'स्पूफिंग' कहते हैं। अमेरिका को लगा जहाज कहीं और हैं, जबकि वे शांति से तेल लेकर निकल चुके थे। यह सीधे तौर पर नाकेबंदी में एक बड़ी सेंध है।
ईरान पर सालों से कड़े प्रतिबंध हैं। उसका तेल बेचना लगभग नामुमकिन बना दिया गया है। फिर भी वो बेच रहा है। कैसे? जवाब है—घोस्ट फ्लीट या 'परछाईं जहाजों' का बेड़ा। हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। अगर यहाँ ईरान अपनी मर्जी चलाने लगे, तो ग्लोबल मार्केट में कोहराम मच जाएगा।
रडार की आंखों में धूल झोंकने वाला खेल
समुद्र में हर बड़े जहाज के लिए 'ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम' (AIS) चालू रखना अनिवार्य है। यह सिस्टम बताता है कि जहाज कहाँ है, किस दिशा में जा रहा है और उसकी गति क्या है। ईरान के इन दो जहाजों ने इसे बंद नहीं किया, बल्कि इसमें हेरफेर किया। उन्होंने डिजिटल सिग्नल के साथ छेड़छाड़ की। सैटेलाइट को जो डेटा मिला, उसके मुताबिक जहाज ओमान की खाड़ी में खड़े थे। असल में वे हॉर्मुज पार कर चुके थे।
यह केवल स्विच ऑफ करने जैसा आसान काम नहीं है। अगर आप सिग्नल बंद कर देते हैं, तो कोस्ट गार्ड को तुरंत शक हो जाता है। लेकिन अगर आप गलत सिग्नल भेजते हैं, तो सिस्टम को लगता है कि सब कुछ ठीक है। ईरान ने इसी 'भ्रम' का फायदा उठाया। अमेरिकी निगरानी तंत्र को चकमा देने के लिए उन्होंने फर्जी कोऑर्डिनेट्स का इस्तेमाल किया। इसे आप डिजिटल नकाबपोश कह सकते हैं।
हॉर्मुज का भूगोल और ईरान की जिद
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की चौड़ाई कुछ ही किलोमीटर है। एक तरफ ओमान है और दूसरी तरफ ईरान। जहाजों को निकलने के लिए एक बहुत ही संकरे रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है। यहाँ अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा (5th Fleet) हमेशा तैनात रहता है। उनके पास दुनिया के सबसे बेहतरीन रडार और निगरानी विमान हैं। इसके बावजूद ईरान ने दो भारी-भरकम तेल टैंकरों को वहां से निकाल लिया।
यह घटना बताती है कि तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो, उसमें लूपहोल्स हमेशा रहते हैं। ईरान ने इन कमियों को पहचाना। उन्होंने देखा कि एआईएस डेटा को जमीन पर बैठे ऑपरेटर या सैटेलाइट आंख बंद करके सच मान लेते हैं। जब तक विजुअल कंफर्मेशन (आंखों से देखना) नहीं होता, तब तक सिस्टम को धोखा दिया जा सकता है। रात के अंधेरे और खराब मौसम का फायदा उठाकर इन जहाजों ने अपना रास्ता बदला।
आखिर अमेरिका कहाँ चूक गया
अमेरिका का पूरा सिस्टम डेटा पर आधारित है। वे एल्गोरिदम और सैटेलाइट फीड पर भरोसा करते हैं। ईरान ने इसी भरोसे को हथियार बनाया। जब रडार पर जहाज एक जगह स्थिर दिख रहे थे, तब किसी ने ये नहीं सोचा कि सिग्नल के पीछे की सच्चाई कुछ और हो सकती है। यह इंटेलिजेंस की विफलता से ज्यादा 'ओवर-रिलायंस ऑन टेक्नोलॉजी' का मामला है।
इसके अलावा, इन जहाजों के नाम और पहचान भी अक्सर बदल दिए जाते हैं। आज जो जहाज 'स्टार' है, कल वो 'मून' बन जाता है। पेंट बदल दिया जाता है, कागजात फर्जी बना लिए जाते हैं और झंडा किसी तीसरे देश का लगा दिया जाता है। इसे 'शिप-टू-शिप ट्रांसफर' (STS) के साथ जोड़कर देखें तो खेल और भी गहरा हो जाता है। समंदर के बीचों-बीच एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल पलट दिया जाता है। अमेरिका को पता भी नहीं चलता कि कौन सा तेल किस कुएं से निकला है।
वैश्विक तेल बाजार पर इसका असर
अगर ईरान इसी तरह प्रतिबंधों को धता बताकर तेल बेचता रहा, तो अमेरिका की आर्थिक नाकेबंदी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। चीन जैसे देश ईरान से भारी मात्रा में तेल खरीदते हैं। उन्हें सस्ते तेल की जरूरत है और ईरान को पैसे की। दोनों के बीच यह डिजिटल लुका-छिपी का खेल चलता रहता है। इससे तेल की कीमतों में स्थिरता तो रहती है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर तनाव चरम पर पहुंच जाता है।
हॉर्मुज में जो हुआ, वो भविष्य के समुद्री युद्ध का एक ट्रेलर है। अब मिसाइलों से ज्यादा खतरनाक 'गलत डेटा' साबित हो रहा है। अगर आप दुश्मन को ये यकीन दिला दें कि आप वहां नहीं हैं जहां आप असल में हैं, तो आप आधी जंग जीत चुके हैं। ईरान ने यही किया। उन्होंने बिना एक भी गोली चलाए दुनिया की सबसे बड़ी सुपरपावर को ठेंगा दिखा दिया।
क्या इसे रोका जा सकता है
इस तरह की स्पूफिंग को रोकना बहुत मुश्किल है। इसके लिए हर जहाज की फिजिकल चेकिंग करनी होगी, जो हॉर्मुज जैसे व्यस्त रास्ते पर असंभव है। हर रोज वहां से सैकड़ों जहाज गुजरते हैं। हर एक को रोकना मतलब ग्लोबल सप्लाई चेन को ठप्प करना है। अमेरिका अब 'सिंथेटिक अपर्चर रडार' (SAR) जैसी तकनीकों पर जोर दे रहा है जो बादलों और अंधेरे के पार भी देख सकती हैं। लेकिन ईरान भी अपनी चालें बदल रहा है।
अगली बार जब आप पेट्रोल पंप पर तेल भरवाएं, तो याद रखिएगा कि उस तेल का एक हिस्सा शायद किसी ऐसे जहाज से आया हो जो रडार पर 'गायब' था। यह समंदर की लहरों पर चल रही शतरंज की एक ऐसी बिसात है जहां वज़ीर और घोड़े नहीं, बल्कि जीपीएस सिग्नल और सैटेलाइट डेटा मोहरे हैं।
अब समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) इन नियमों को सख्त करे। केवल AIS पर भरोसा करना अब सुरक्षित नहीं रहा। जहाजों के लिए मल्टी-लेयर वेरिफिकेशन सिस्टम जरूरी हो गया है। कंपनियों को अपने जहाजों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए एन्क्रिप्टेड सिस्टम का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि कोई बाहरी ताकत सिग्नल के साथ छेड़छाड़ न कर सके। अगर निगरानी करने वाली एजेंसियां सतर्क नहीं हुईं, तो हॉर्मुज जैसी घटनाएं रोज की बात बन जाएंगी। समुद्री सुरक्षा के लिए अब डिजिटल और फिजिकल पेट्रोलिंग का तालमेल ही एकमात्र रास्ता बचा है।