इंटरनेशनल मीडिया में अचानक आई एक खबर ने पूरी दुनिया के राजनयिक गलियारों में खलबली मचा दी है। खबर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के दौरान हुई एक टॉप सीक्रेट बातचीत के लीक होने से जुड़ी है। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बंद कमरे में ट्रंप से कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को शायद यूक्रेन पर हमला करने का पछतावा हो रहा है।
अब सवाल उठता है कि क्या वाकई पुतिन जैसा ताकतवर नेता चार साल से चल रहे इस युद्ध से तंग आ चुका है? या फिर शी जिनपिंग इस तरह के बयान देकर ट्रंप के सामने एक नया जाल बुन रहे हैं? बीजिंग ने इस खबर को अफवाह बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया है। लेकिन जब बात ग्लोबल पॉलिटिक्स की हो तो बिना आग के धुआं नहीं उठता।
सीक्रेट टॉक में क्या हुआ था दावा
लीक हुई जानकारी के मुताबिक 15 मई को बीजिंग में ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच एक हाई-लेवल मीटिंग हुई थी। इसी दौरान जिनपिंग ने अपनी पुरानी चुप्पी तोड़ी। इससे पहले जो बाइडन के साथ हुई तमाम मुलाकातों में जिनपिंग ने कभी भी पुतिन या यूक्रेन युद्ध पर अपनी निजी राय खुलकर नहीं रखी थी।
मगर ट्रंप के सामने जिनपिंग ने सीधे कह दिया कि पुतिन को इस आक्रमण पर अब पछतावा हो सकता है। यह बात इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि इस बातचीत के ठीक चार दिन बाद खुद व्लादिमीर पुतिन दो दिवसीय द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के लिए बीजिंग पहुंचने वाले हैं। पुतिन के पैर चीन की धरती पर पड़ने से ठीक पहले इस तरह की बातचीत का बाहर आना इत्तेफाक तो नहीं हो सकता।
वाशिंगटन का नया दांव या जिनपिंग की मजबूरी
इस लीक के पीछे की टाइमिंग को समझना बहुत जरूरी है। युद्ध अब पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है। यूक्रेन लगातार रूसी ठिकानों और मॉस्को के आस-पास के इलाकों पर ड्रोनों से भीषण हमले कर रहा है। ऐसे समय में जब रूस और चीन मिलकर एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की बात कर रहे हैं, तब इस तरह की खबर का आना दोनों देशों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश भी हो सकती है।
हो सकता है कि वाशिंगटन ने जानबूझकर यह जानकारी लीक की हो ताकि पुतिन के बीजिंग पहुंचने से पहले रूस और चीन के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी की जा सके। वहीं दूसरी तरफ इसका एक पहलू यह भी है कि चीन पर इस समय पश्चिमी देशों का भारी आर्थिक दबाव है। जिनपिंग शायद ट्रंप को यह दिखाना चाहते हैं कि वे रूस के आंख मूंदकर समर्थक नहीं हैं, बल्कि वे भी युद्ध के नुकसान को समझते हैं।
क्या कहता है बीजिंग और ट्रंप का आधिकारिक रुख
इस रिपोर्ट के आते ही हड़कंप मचना तय था, सो मचा। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और साफ कहा:
"यह जानकारी पूरी तरह से मनगढ़ंत है और हवा में तैयार की गई है। इसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है।"
दिलचस्प बात यह है कि व्हाइट हाउस ने इस पर चुप्पी साध रखी है। ट्रंप प्रशासन ने इस समिट के बाद जो फैक्ट शीट जारी की थी, उसमें यूक्रेन या पुतिन का कोई जिक्र तक नहीं था। मगर अंदरखाने से खबर यह भी आ रही है कि इसी बैठक में डोनाल्ड ट्रंप ने चीन और रूस के सामने एक अजीबोगरीब प्रस्ताव रखा था। ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका, चीन और रूस को मिलकर इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, क्योंकि यह कोर्ट तीनों ही देशों के हितों के आड़े आता है।
युद्ध के मैदान की कड़वी सच्चाई
पुतिन को पछतावा है या नहीं, यह तो केवल वे खुद जानते हैं। लेकिन रूस के भीतर की आर्थिक और सैन्य स्थिति को देखें तो युद्ध अब मॉस्को के लिए भी गले की हड्डी बन चुका है। यूक्रेन के ड्रोन हमलों ने रूसी नागरिकों को यह अहसास करा दिया है कि युद्ध अब उनके घर तक पहुंच चुका है। रूस के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने भी हाल ही में कहा था कि वे उम्मीद करते हैं कि अमेरिका इस युद्ध को खत्म कराने और शांति वार्ता शुरू कराने में मदद करेगा।
रूस अब इस जंग से एक सम्मानजनक एग्जिट रूट ढूंढ रहा है। दूसरी तरफ यूक्रेन भी अब पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस पूरी भू-राजनीतिक खींचतान में अब गेंद डोनाल्ड ट्रंप के पाले में है, जो बार-बार दावा करते रहे हैं कि वे इस युद्ध को कुछ ही दिनों में रुकवा सकते हैं।
अगर आप इस तरह के वैश्विक घटनाक्रमों को करीब से समझना चाहते हैं, तो आपको केवल आधिकारिक बयानों पर भरोसा करना छोड़ना होगा। खबरों के पीछे छुपे नैरेटिव और टाइमिंग को देखना शुरू कीजिए। आने वाले कुछ दिनों में पुतिन की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के संयुक्त बयानों और बॉडी लैंग्वेज पर पैनी नजर रखें। असली कहानी वहीं से साफ होगी।